यूँ ना देखो मुझें साहिब, अपनी हैरत भरी इन निग़ाहों से,
ज़ख़्मी हुआ हूँ काँटे चुनते-चुनते, किसी अपने की राहों से !
Yoon na dekho mujhen sahib, apni hairat bhari in nigahon se,
Zakhmi hua hoon kanten chunte-chunte, kisi apne ki rahon se !
- Article By. Dharm_Singh
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